रेत की जिन्दगी में पत्थर खोजता हूँ।
अपनी मुट्ठी में रेत को कैद करना चाहता हूँ।।
रोज इन्तजार करता हूँ सुबह के उस उजाले की जो मुझे समझ ले।
मगर आज भी ये इंतजार करवा कर निकल गयी।।
समुन्द्र के लहरों पे बैठ कर देखना चाहता हूँ दुनिया को।
रात की चांदनी में डुबोना चाहता हूँ खुद को।।
जल के कभी उजाला भी आएगा मेरे पास।
कैद कर लूँगा उसे भी अपनी मुट्ठी में।।
खुदा से खुद को पाना चाहता हूँ।
चट्टान बनकर भी धरती का फूल बनना चाहता हूँ।।
कहना चाहता हूँ साहिल के मुसाफिरों से
"डूबने से कभी डरना मत लेकिन साहिल पे कभी डूबना मत।"
दिशा देना चाहता हूँ इस दुनिया को अपनी छोटी सी चिराग से।
लेकिन डरता हूँ चिराग की कालिख से।।
अपने दर्द की एक धुन बनाना चाहता हूँ।
उसे गुनगुना के दुनिया को सुनना चाहता हूँ।।
बदल पे एक छोटा सा आशियाना बनाना चाह्ताचाहता हूँ।
जीवन के हर दिवार में रंग भरना चाहता हूँ।।
हवा के झरोखों को अपना कवच बनाना चाहता हूँ।
आग के दरिया को बिना दुबे पार करना चाहता हूँ।।
चाहता हूँ की कुछ ऐसा करूँ की चाहत मिट जाये।
लेकिन मैं तो चाहत की चाहत बन चूका हूँ।।
मौसम को अपने मन का गुलाम बनाना चाहता हूँ।
रब को एक छोटा सा पैगाम देना चाहता हूँ-
"जी सकता हूँ मैं तेरे बिना;
हाँ, जी सकता हूँ मैं तेरे बिना "
No comments:
Post a Comment