कहीं बैठा वो गुलाब की पंखुरियां तोड़ रहा था।
सारे रश्मों रिवाजों को भुला चूका था मैं।
उनकी यादें एक सिहरन दे गयीं मुझे।
अब बिखरने वाला था मैं मगर मैं अटूट था।
एक जाना पहचाना सा झिलमिलाहट था आखों के सामने।
एक मुस्कुराहट थी जो आखें नम कर जाती है।
मैंने अपने असीमित ताकत का एहसास किया।
एक ऐसी ताकत जिस से मैं हमेशा से अनजान था।
उन्हें जाते देख भी मैं चुप था।
इस सांसारिक नियमों से मैं अनजान नहीं था,
मगर अपने आखों के सामने ये दर्दनाक था।
कभी फुर्सत से मिला नहीं था मैं।
उनकी सारी छोटी मुलाकातों को जोड़ कर एक याद बनाना चाहता हूँ।
एक फुर्सत भरे पल में उनको महसूस करना चाहता हूँ।
अब मैं उनके करीब आना चाहता हूँ।
अब मैं उनमे समाना चाहता हूँ।।
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