बिन सींचे मैं रेत हुयी,
अब हवा भी मुझको बेहकावत है;
छोड़ दे मुझको ए माली ,
हवा संग मोहे भागन दै।
मिट्टी से मैं रेत हुयी,
खामी नाही मुझमे है ;
अब भी संयो कर राखे मुझको ,
तोहे लाज़ नाही आवत है ?
ले अब मैं बहक गयी,
अब काहे मुझको सींचत है ;
राम नाम के भक्ति ,
अब तोहे याद नाही आवत है ?
आजाद हुयी, मैं आबाद हुयी ,
अब काहे मुझको ढूंढत है?
भक्ति के पहर भयो ,
अब तोहे भक्ति याद ना आवत है?