उमंगों की लहरें उफानों पर थीं,
और मन बादलों के बीच था।
मैं खुद को भुला चुका था ,
यहाँ गरीब कौन था?
रहने को छत थी और सोने को जमीं ,
दुनिया आसमां को छत मानती , मेरा क्या कसूर था?
तारे देख मैं भी सपने बुना करता था ,
और उमंगों में रंग भरा करता था।
छोटी छोटी जीत उम्मीदों की पुल बाँधती थी ,
चेहरे पे एक संतुस्ट मुस्कान लाती थीं।
आकांछाओ को मेरे तुमने हीं बढाया था ,
मेरा छत छोटा है , ये मुझे तुमने हीं बतलाया था।
बाँध के बस्ता छोटा निकल पड़ा जीतने को ,
सोंचा बड़े छत वाले खुसी से अपनाएंगे मुझको।
चाक चौंध से भरी जिन्दगी देख मैं हैरान था ,
उम्मीदें बढती गयीं फिर भी मैं नाकाम था।
कमाया भी मेहनत से और लुटाया भी खूब ,
क्या इसीलिए इनकी छत बड़ी थी खूब।
भीड़ में खो कर भूल गया था खुद को,
उनके सपने साकार कर रहा था जो पहचानते नहीं थे मुझको।
इस विशाल छत ने मुझे कुछ एहसास दिलाया था ,
बार बार नकारता पर मैं एक अनचाहा गरीब था।
लौट गया छोटी सी छत में जिसने मुझे पाला था ,
आज भी इसने मुझे सहजता से अपनाया है।
उम्मीदें फिर से जागीं पर दिल अब भी घबराता है ,
बिना तोड़े छोटी सी छत को बड़ा कैसे बनाना है?
सारे छोटे छतों को जोड़ दिया और ,
उनके सपनों को अपना बना लिया।
मैं गरीब नहीं हूँ ,
आखिर मैंने दिखला दिया।।
bahut khub......it is really good.....
ReplyDeletethanku bro...!!
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