Sunday, October 28, 2012

बदलाव




कभी आसुओं को रोका करता था मैं क्यूंकि मुझमें उन्हें रोकने की ताकत थी,

अब तो वो यूँ ही निकल जाती हैं और मुझे पता भी नहीं चलता।


अपने ठहाके को समेट कर मुस्कुराहट  बनाता था कभी,

अब तो मुस्कुराहट को भी बुलाना पड़ता है।


खुल कर आती थी जो बात लबों पर ,

वो अब पूछ के आती हैं।


कभी सोचा करता था की काश मेरे भी कुछ बड़े बड़े शौक होते,

ये शौक कब जरुरत बन गए पता ही नहीं चला।


कभी अपनी एक हसी से मनाया करता था सभी को,

आज वो हसी के लिए खुद को मनाता हूँ।


कभी खुद के लिए जीता था मैं,

आज अपनों के लिए जीता हूँ।।
टकरा कर उसमे समाना चाहती थी।

बार बार कोशिश की लेकिन  हर कोशिश नाकाम हुयी।

हार न मान कर तोड़ डाला उसे।

उसको खुद में मिलाना चाहती थी।

अब भी वो खामोश था।

थक कर सामने वाले पत्थर से बोली,
"तुम भी कोशिश करो "

दोनों खामोश थे।

पत्थर ने ख़ामोशी तोड़ी,
"तेरी वजह से मैं रेत बन गया मगर फिर भी तुझमे समां ना सका।
तेरी बढती भूक ने बार बार मुझे तुझसे अलग किया है।
मुझे इस्तेमाल कर के बार बार तुमने फेका है।
जा लौट जा फिर कभी वापस मत आना।"

तिलमिला उठी लहर मगर हार न मानी।

साहस  समेत फिर समाने गयी पत्थर में।

आज भी लहर खामोश नहीं है ,
आज भी पत्थर उदास है।

Friday, October 5, 2012

चाहत




रेत की जिन्दगी में पत्थर खोजता हूँ।
अपनी मुट्ठी में रेत को कैद करना चाहता हूँ।।

रोज इन्तजार करता हूँ सुबह के उस उजाले की जो मुझे समझ ले।
मगर आज भी ये इंतजार करवा कर निकल गयी।।

समुन्द्र के लहरों पे बैठ कर देखना चाहता हूँ दुनिया को।
रात की चांदनी में डुबोना चाहता हूँ खुद को।।

जल के कभी उजाला भी आएगा मेरे पास।
कैद कर लूँगा उसे भी अपनी मुट्ठी में।।

खुदा से खुद को पाना चाहता हूँ।
चट्टान बनकर भी धरती का फूल बनना चाहता हूँ।।

कहना चाहता हूँ साहिल के मुसाफिरों से 
"डूबने से कभी डरना मत लेकिन साहिल पे कभी डूबना मत।"

दिशा देना चाहता हूँ इस दुनिया को अपनी छोटी सी चिराग से।
लेकिन डरता हूँ चिराग की कालिख से।।

अपने दर्द की एक धुन बनाना चाहता हूँ।
उसे गुनगुना के दुनिया को सुनना चाहता हूँ।।

बदल पे एक छोटा सा आशियाना बनाना चाह्ताचाहता हूँ।
जीवन के हर दिवार में रंग भरना चाहता हूँ।।

हवा के झरोखों को अपना कवच बनाना चाहता हूँ।
आग के दरिया को बिना दुबे पार करना चाहता हूँ।।

चाहता हूँ की कुछ ऐसा करूँ की चाहत मिट जाये।
लेकिन मैं तो चाहत की चाहत बन चूका हूँ।।

मौसम को अपने मन का गुलाम बनाना चाहता हूँ।
रब को एक छोटा सा पैगाम देना चाहता हूँ-

"जी सकता हूँ मैं तेरे बिना;
हाँ, जी सकता हूँ मैं तेरे बिना "