Sunday, October 28, 2012

बदलाव




कभी आसुओं को रोका करता था मैं क्यूंकि मुझमें उन्हें रोकने की ताकत थी,

अब तो वो यूँ ही निकल जाती हैं और मुझे पता भी नहीं चलता।


अपने ठहाके को समेट कर मुस्कुराहट  बनाता था कभी,

अब तो मुस्कुराहट को भी बुलाना पड़ता है।


खुल कर आती थी जो बात लबों पर ,

वो अब पूछ के आती हैं।


कभी सोचा करता था की काश मेरे भी कुछ बड़े बड़े शौक होते,

ये शौक कब जरुरत बन गए पता ही नहीं चला।


कभी अपनी एक हसी से मनाया करता था सभी को,

आज वो हसी के लिए खुद को मनाता हूँ।


कभी खुद के लिए जीता था मैं,

आज अपनों के लिए जीता हूँ।।

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