नादान सी वो बचपन हैवान बन गई,
जब से भूख कि तड़प असहनीय बन गयी।
तानों कि बौछारों से प्यास बुझाता,
भूख कि ख्याल से पीछा छुड़ाता।
नासमझ सी उम्र में दुनिया समझ गया,
जहाँ सुविधा, सुविधाएं वालों को नसीब थी।
शिक्षा कि महत्व से भली भांति परिचित था,
जो दो गज़ जमीं अर्ज़ने को उम्र मांगती थी।
भीड़ को पंक्तियों में संयोजने का तरीका था शिक्षा,
भीड़ कि तादाद देख कर दिल सहम गया।
धीरे धीरे बढ़ रही भीड़ छाया को मोहताज़ थी,
मेरे पास न तो छाया थी और ना हीं सब्र।
मन के विश्वास को सब्र से खो नहीं सकता था,
भीड़ से अलग चलना शुरू किया।
कठिनाइयों से भड़ी सड़क हर पग पर रोकती,
भीड़ कि हसीं काटों सी चुभती।
बुनियाद भूख कि थी और खोने को ये दुनिया,
हौसले टूटते नहीं थे , तन थखत नहीं था।
उन राहों से मेरी अब बनने लगी थी,
मंजिल जैसे अब नजदीक आने लगी थी।
बिन मंजिल के मैंने मंजिल पा ली,
लेकिन भूख कि तड़प तो आदत बन गयी थी।
उस राह ने मुझे यहाँ पहुचाया है,
जिसने कथित भीड़ को तोडा है।
शिक्षा और सब्र इस राह को भी नहीं छोड़े,
लेकिन नयी राह बनाने कि होड़ आज भी लगी है।
The Lines are very creative and shows the inspiration for entrepreneurship.
ReplyDeleteAnd the Man seeking to be it, that deeper men go into life, the deeper is their conviction that this life is not all. It is an unfinished symphony. A day may round out an insect’s life, and a bird or a beast needs no tomorrow. Not so with him who knows that he is related to God and has felt the power of an endless life.
Because he knows "LIFE IS VERY LONG;IF WE KNOW HOW TO USE IT " .