Sunday, July 21, 2013

क्या मैं अनचाहा गरीब था ?


उमंगों की लहरें उफानों पर थीं,
और मन बादलों के बीच था।

मैं खुद को भुला चुका था ,
यहाँ गरीब कौन था?

रहने को छत थी और सोने को जमीं ,
दुनिया आसमां को छत मानती , मेरा क्या कसूर था?

तारे देख मैं भी सपने बुना करता था ,
और उमंगों में रंग भरा करता था।

छोटी छोटी जीत उम्मीदों की पुल बाँधती थी ,
चेहरे पे एक संतुस्ट मुस्कान लाती थीं।

आकांछाओ  को मेरे तुमने हीं बढाया था ,
मेरा छत छोटा है , ये मुझे तुमने हीं बतलाया था।

बाँध के बस्ता छोटा निकल पड़ा जीतने को ,
सोंचा बड़े छत वाले खुसी से अपनाएंगे मुझको।

चाक चौंध से भरी जिन्दगी देख मैं हैरान था ,
उम्मीदें बढती गयीं फिर भी मैं नाकाम था।

कमाया भी मेहनत से और लुटाया भी खूब ,
क्या इसीलिए इनकी छत बड़ी थी खूब।

भीड़ में खो कर भूल गया था खुद को,
उनके सपने साकार कर रहा था जो पहचानते नहीं थे मुझको।

इस विशाल छत ने मुझे कुछ एहसास दिलाया था ,
बार बार नकारता पर मैं एक अनचाहा गरीब था।

लौट गया छोटी सी छत में जिसने मुझे पाला था ,
आज भी इसने मुझे सहजता से अपनाया है।

उम्मीदें फिर से जागीं पर दिल अब भी घबराता है ,
बिना तोड़े छोटी सी छत को बड़ा कैसे बनाना है?

सारे छोटे छतों को जोड़ दिया और ,
उनके सपनों को अपना बना लिया।

मैं गरीब नहीं हूँ ,
आखिर मैंने दिखला दिया।।

Friday, April 5, 2013

काश…



चन्द राहें और एक मंज़िल होती ,
राहें थोड़ी सी आसन होती।

सूर्य के भी पलक होते,
पल पल कुछ पल का छाव मिलता।

मजबूरियाँ और जिम्मेदारियों की सिर्फ कहानियां होती,
बंदिशों की कोई गुंजाइश न होती।

सिर्फ जीनें के लिए कुछ करना ना होता,
भरोसे को कमाना हीं मकसद होता।

इर्ष्या के बादल रौशनी ढक न पाते,
प्यार के राह पर दुनिया चलती।

इस दुनिया में सिर्फ संगीत सुन पाते हम,
शोर को खुद से दूर रख पाते हम।

आशियानें की कोई जरुरत न होती,
दुनिया ही हमारा आशियाना होता।

किसी का कोई मूल्य न होता,
कोई भी कुछ भी ले सकता।

जो करते वो लक्ष्य बन जाता,
उनको पूरा करने के लिए जद्दोजहद न करना होता।

किसी के उम्मीद को पूरा न करना होता,
उम्मीद का बनना हीं नामुमकिन होता।

किसी की हमसे हमदर्दी न होती,
हमसे जुड़ी उन हमदर्दियों को आसानी से मिटा पातें।

कुदरत के मौसम पे हमारी हुकूमत होती,
हमारा मन, हमारा गुलाम होता।

घरी के साथ वक़्त भी बिकता,
वक़्त हमारा गुलाम बन जाता।

इंसानों को आसानी से पहचान पाते,
उनके चित्त को हम देख पाते।

दुःख के अँधेरे हमें ढक न पाते,
खुसी का वो उजाला हमेशा होता।

लेकिन, दुःख हमारा हिस्सा ना होता 
तो ख़ुशी को हम पहचान ना पाते।।

Tuesday, April 2, 2013

पछतावा




उनकी आजादियों को मैं कहाँ छिनना चाहता था ,
मैं तो साय की तरह उनका हमसफ़र बनना चाहता था।

कुछ बादलों ने सूर्य को छुपा दिया और मैं ,
मैं अँधेरे में गुमनाम हो गया।

उनके भरोसे को अपनी दौलत समझता था ,
मंदी की उस दौर में वो आखिरी दौलत भी खो बैठा।

उनकी अनमोल आसुओं को बेमोल कर चूका था मैं,
एक बार और झगरना चाहता हूँ मैं उनसे ,
गहराती हुयी अंधेरों को दूर करना चाहता हूँ मैं।

सुनीं हैं ये बाहें जब से वो गए हैं ,
एक बार फिर से ये भरना चाहती हैं उनको।

उनकी दामन की खुश्बू  धरकने  तेज कर जाती थी ,
मेरे नादान दिल ने वो इंधन भी खो दिया।

उनकी मुस्कुराहट मेरे थकान  की दावा बन चुकी थी,
अब मैं और थकान  बर्दास्त नहीं कर सकता।

बालों में उनके उँगलियों के स्पर्श मुझे सपनों की दुनिया में ले जाते थे,
हकीकत की इस दुनिया से थक चूका हूँ मैं।।