Friday, April 5, 2013

काश…



चन्द राहें और एक मंज़िल होती ,
राहें थोड़ी सी आसन होती।

सूर्य के भी पलक होते,
पल पल कुछ पल का छाव मिलता।

मजबूरियाँ और जिम्मेदारियों की सिर्फ कहानियां होती,
बंदिशों की कोई गुंजाइश न होती।

सिर्फ जीनें के लिए कुछ करना ना होता,
भरोसे को कमाना हीं मकसद होता।

इर्ष्या के बादल रौशनी ढक न पाते,
प्यार के राह पर दुनिया चलती।

इस दुनिया में सिर्फ संगीत सुन पाते हम,
शोर को खुद से दूर रख पाते हम।

आशियानें की कोई जरुरत न होती,
दुनिया ही हमारा आशियाना होता।

किसी का कोई मूल्य न होता,
कोई भी कुछ भी ले सकता।

जो करते वो लक्ष्य बन जाता,
उनको पूरा करने के लिए जद्दोजहद न करना होता।

किसी के उम्मीद को पूरा न करना होता,
उम्मीद का बनना हीं नामुमकिन होता।

किसी की हमसे हमदर्दी न होती,
हमसे जुड़ी उन हमदर्दियों को आसानी से मिटा पातें।

कुदरत के मौसम पे हमारी हुकूमत होती,
हमारा मन, हमारा गुलाम होता।

घरी के साथ वक़्त भी बिकता,
वक़्त हमारा गुलाम बन जाता।

इंसानों को आसानी से पहचान पाते,
उनके चित्त को हम देख पाते।

दुःख के अँधेरे हमें ढक न पाते,
खुसी का वो उजाला हमेशा होता।

लेकिन, दुःख हमारा हिस्सा ना होता 
तो ख़ुशी को हम पहचान ना पाते।।

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