Saturday, October 4, 2014

बंज़र

बिन सींचे मैं रेत हुयी,
अब हवा भी मुझको बेहकावत है;

छोड़ दे मुझको ए माली ,
हवा संग मोहे भागन दै। 


मिट्टी से मैं रेत हुयी,
खामी नाही मुझमे है ;

अब भी संयो कर राखे मुझको ,
तोहे लाज़ नाही आवत है ?


ले अब मैं बहक गयी,
अब काहे मुझको सींचत है ;

राम नाम के भक्ति ,
अब तोहे याद नाही आवत है ?


आजाद हुयी, मैं आबाद हुयी ,
अब काहे मुझको ढूंढत है?

भक्ति के पहर भयो ,
अब तोहे भक्ति याद ना आवत है?

Wednesday, August 13, 2014

कोशिश


सोया नहीं था मैं , ना तो जाग रहा था ; 
खुद को ना जानें क्या समझा रहा था।


ओझल हुई आशा की किरण को वापस लाने की कोशिश थी शायद ;
मन को बहला , दो कदम और चलने की कोशिश थी ये। 


ख्वाबों के बड़े होने पे भी पाबन्द लग गया था ;
सोंच का दायरा भी खुद में सिमट सा गया था। 


बंद कमरे से निकलने की फुर्सत मिली है आज ;
चाहत को बढ़ाने का मौका मिला है आज। 


टुक टुक देखता टिमटिमाते तारों को ;
मानों आज वर्षों बाद मिलें हों इसको। 


सन्नाटों से शोर शराबों की ओर निकल पड़ा मैं ;
खुद को तलाशने की एक और कोशिश थी ये। 

Friday, February 7, 2014

मंज़िल



नादान सी वो बचपन हैवान बन गई,
जब से भूख कि तड़प असहनीय बन गयी।


तानों कि बौछारों से प्यास बुझाता,
भूख कि ख्याल से पीछा छुड़ाता।


नासमझ सी उम्र में दुनिया समझ गया,
जहाँ सुविधा, सुविधाएं वालों को नसीब थी। 


शिक्षा कि महत्व से भली भांति परिचित था,
जो दो गज़ जमीं अर्ज़ने को उम्र मांगती थी। 


भीड़ को पंक्तियों में संयोजने का तरीका था शिक्षा,
भीड़ कि तादाद देख कर दिल सहम गया। 


धीरे धीरे बढ़ रही भीड़ छाया को मोहताज़ थी,
मेरे पास न तो छाया थी और ना हीं सब्र। 


मन के विश्वास को सब्र से खो नहीं सकता था,
भीड़ से अलग चलना शुरू किया। 


कठिनाइयों से भड़ी सड़क हर पग पर रोकती,
भीड़ कि हसीं काटों सी चुभती। 


बुनियाद भूख कि थी और खोने को ये दुनिया,
हौसले टूटते नहीं थे , तन थखत नहीं था। 


उन राहों से मेरी अब बनने लगी थी,
मंजिल जैसे अब नजदीक आने लगी थी। 


बिन मंजिल के मैंने मंजिल पा ली,
लेकिन भूख कि तड़प तो आदत बन गयी थी। 


उस राह ने मुझे यहाँ पहुचाया है,
जिसने कथित भीड़ को तोडा है। 


शिक्षा और सब्र इस राह को भी नहीं छोड़े,
लेकिन नयी राह बनाने कि होड़ आज भी लगी है।