चहकती सी इस जिन्दगी में जीना सिख चूका हूँ मैं।
दुःख के चीख के साथ हँसना भी सिख चूका हूँ मैं।
अँधेरे में खुद की पहचान खोकर भी खुस रहता हूँ।
उजाले में पहचान पाकर भी खुस रहता हूँ।
अरमान तो कई थे मगर पुरे हो न सकें।
इन अरमानों को सपने में सच कर के खुस रहता हूँ।
मुस्कुरा मुस्कुरा के हँसना भी सिख लिया।
अब तो ठहाके भी लगा लेता हूँ मैं।।
No comments:
Post a Comment