सोया नहीं था मैं , ना तो जाग रहा था ;
खुद को ना जानें क्या समझा रहा था।
ओझल हुई आशा की किरण को वापस लाने की कोशिश थी शायद ;
मन को बहला , दो कदम और चलने की कोशिश थी ये।
ख्वाबों के बड़े होने पे भी पाबन्द लग गया था ;
सोंच का दायरा भी खुद में सिमट सा गया था।
बंद कमरे से निकलने की फुर्सत मिली है आज ;
चाहत को बढ़ाने का मौका मिला है आज।
टुक टुक देखता टिमटिमाते तारों को ;
मानों आज वर्षों बाद मिलें हों इसको।
सन्नाटों से शोर शराबों की ओर निकल पड़ा मैं ;
खुद को तलाशने की एक और कोशिश थी ये।
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