उनकी आजादियों को मैं कहाँ छिनना चाहता था ,
मैं तो साय की तरह उनका हमसफ़र बनना चाहता था।
कुछ बादलों ने सूर्य को छुपा दिया और मैं ,
मैं अँधेरे में गुमनाम हो गया।
उनके भरोसे को अपनी दौलत समझता था ,
मंदी की उस दौर में वो आखिरी दौलत भी खो बैठा।
उनकी अनमोल आसुओं को बेमोल कर चूका था मैं,
एक बार और झगरना चाहता हूँ मैं उनसे ,
गहराती हुयी अंधेरों को दूर करना चाहता हूँ मैं।
सुनीं हैं ये बाहें जब से वो गए हैं ,
एक बार फिर से ये भरना चाहती हैं उनको।
उनकी दामन की खुश्बू धरकने तेज कर जाती थी ,
मेरे नादान दिल ने वो इंधन भी खो दिया।
उनकी मुस्कुराहट मेरे थकान की दावा बन चुकी थी,
अब मैं और थकान बर्दास्त नहीं कर सकता।
बालों में उनके उँगलियों के स्पर्श मुझे सपनों की दुनिया में ले जाते थे,
हकीकत की इस दुनिया से थक चूका हूँ मैं।।
No comments:
Post a Comment